भोपाल नगर निगम से निकाय चुनावों पर फंसा पेंच, जारी है असमंजस

भोपाल नगर निगम से निकाय चुनावों पर फंसा पेंच, जारी है असमंजस



भोपाल । स्थानीय स्तर पर विकास में अहम रोल निभाने वाली शहर सरकार के चुनावों के लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों की लगभग पूरी तैयारी हो चुकी है, लेकिन इसको लेकर अभी संशय की स्थिति बनी हुई है। इसकी वजह है भोपाल नगर निगम के बंटबारे को लेकर कोई फैसला नहीं हो पाना। कांग्रेस जहां सत्ता पाने के बाद ज्यादा से ज्यादा निकायों पर कब्जा जमाने की तैयारी में है, तो भाजपा सरकार की नाकामियों का चिट्ठा लेकर अपनी ताकत बरकरार रखने के मूड में है। सरकार चाहती है कि प्रदेश में 15 अप्रैल तक सभी निकायों के चुनाव हो जाएं, मगर भोपाल नगर निगम के बंटवारे को लेकर पूरी कवायद पर असमंजस बना हुआ है। राज्य में 378 नगरीय निकाय हैं। इसमें 16 नगर निगम, 96 नगर पालिका और 266 नगर परिषद हैं। फरवरी आखिर तक 290 नगरीय निकायों का कार्यकाल समाप्त हो जाएगा। रिक्त हो रहे निकायों में संभागायुक्त, कलेक्टर और एसडीएम को प्रशासक नियुक्त किया जा चुका है। अधिकांश निकायों में बीते डेढ़ दशक से भाजपा का कब्जा है। इनमें सबसे प्रमुख राजधानी की नगर निगम भी शामिल है। अब प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है, सो पार्टी चाहती है कि भोपाल नगर निगम पर भी उसकी सत्ता हो, इसके लिए ही निगम के बंटवारे का दांव चला गया है। कोलार और गोविंदपुरा को भोपाल से अलग कर नया नगर निगम बनाने का। इसका प्रस्ताव भोपाल कलेक्टर, फिर वहां से नगरीय विकास विभाग के प्रमुख सचिव तक पहुंच गया। पीएस ने बंटवारे में आने वाली व्यवहारिक दिक्कतों की टीप लिख कर फाइल राज्य शासन को भेज दी। शासन ने इसे मंजूरी के लिए राज्यपाल को भेज दिया। गवर्नर हाउस में काफी समय से यह विचाराधीन है। इस दौरान भाजपा नेता विकास बोन्दरिया व अन्य ने भोपाल नगर निगम को दो हिस्सों में बांटने को जबलपुर हाई कोर्ट में चुनौती दे दी। इस पर सुनवाई चल रही है।
आरक्षण प्रक्रिया का समय किया कम
अब तक की व्यवस्था में निकाय चुनाव के छह महीने के पहले वार्डों के आरक्षण की प्रक्रिया पूरी करना होती थी। कांग्रेस सरकार को यह नियम रास नहीं आया। आला नेताओं का ऐसा सोचना था कि छह महीने की अवधि ज्यादा है। इतने लंबे समय में जनता सरकार के अच्छे काम भूल सकती है। लिहाजा इस अवधि को घटा कर दो महीने कर दिया गया।
88 निकायों में बाद में होंगे चुनाव
ट्राइबल एरिया के 30 से 35 निकायों में फिलहाल चुनाव नहीं कराए जाएंगे। यहां परिषद का कार्यकाल बचा है। दस निकायों का इस साल सितंबर व सात का दिसंबर, 11 का 2021, 2022 में 41 और 2023 में 19 निकायों की पांच साल की अवधि पूरी होगी। इस तरह 88 निकायों में बाद में चुनाव होंगे।
सत्ता में आते ही कांगे्रस ने बदले नियम
15 साल के वनवास से लौटी कांग्रेस ने नियमों में भी बदलाव किया है। सियासी विरोध के बावजूद यह तय हो चुका है कि अब शहर और नगर सरकार के चुनाव अप्रत्यक्ष प्रणाली से ही होंगे, स्थानीय स्तर पर कांग्रेस की सरकार बने इसके लिए मुख्यमंत्री खुद पार्टी नेताओं के साथ बैठक कर शहरों में कांग्रेस की सरकार बनाने रणनीति बना रहे हैं। पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं को सरकार की योजनाओं, उपलब्धियों को लोगों तक पहुंचाने के लिए कहा गया है।
कांग्रेस की निगाह बड़े शहरों पर
नगरीय निकाय चुनावों में कांग्रेस का सबसे ज्यादा प्रदेश के बड़े शहरों पर फोकस है। वह राजधानी भोपाल समेत इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर जैसे शहरों में अपनी सत्ता चाहती है। पिछली बार हुए चुनाव में प्रदेश के सभी 16 नगर निगमों में भाजपा ने लीन स्वीप किया था। जाहिर है सत्ताधारी कांग्रेस ऐसी स्थिति इस बार नहीं बनने देगी। इसके लिए उसने अभी से राजनीतिक दांव-पेंच चलना शुरू कर दिए हैं। शहर सरकार के प्रशासन में उसका हस्तक्षेप हो इसके लिए अफसरशाही का सहारा भी पिछले दरवाजे से लिया जा रहा है। पार्टी ने अपने मंत्रियों और विधायकों को अभी से शहर में सक्रिय हो जाने के लिए कहा है। इसके लिए सीएम हाउस में दो बार बैठक भी हो चुकी है। दूसरी तरफ भाजपा भी इन चुनावों में अपना परचम फिर से लहराने के लिए एड़ी चोटी एक कर रही है। टिकट वितरण को लेकर अभी से संगठन मंत्रियों से फीडबैक लिया जा रहा है। उसका भी खास फोकस बड़े शहरों पर ही है। चुनाव प्रचार की पूरी कमान पिछली बार की तरह इस बार भी पूर्व सीएम शिवराज के ईद-गिर्द ही रखने की तैयारी अभी से पार्टी के रणनीतिकार कर रहे हैं। बड़े शहरों में केंद्रीय मंत्रियों को भी पार्टी प्रचार के लिए मैदान में उतारेगी।